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Wednesday, February 10, 2016

Vyang -- जरासन्ध का पुनरागमन

खबरी -- बीजेपी ने कहा है की उत्तर प्रदेश में मुगलों का राज है।

गप्पी -- किसी भी चीज की तुलना इतिहास की किसी दूसरी चीज से करना पुरानी परम्परा है। लेकिन उसके लिए कुछ निश्चित मापदण्डों का इस्तेमाल किया जाता है वरना लोग उसे मजाक समझते हैं। इसी आधार पर मैंने सोचा की क्यों ना जम्बु द्वीप के आर्यावर्त के भारत खंड के महान शासक श्री नरेंद्र मोदीजी का कोई उदाहरण इतिहास में ढूंढा जाये। मैंने अपने इतिहास के अल्पज्ञान के बावजूद कई पुरानी पुस्तकों और पुराणो को खोज मारा लेकिन उनके जैसा प्रतापी राजा मुझे इतिहास में नही मिला। आखिर लम्बी शोध के बाद एक राजा मुझे उनके आसपास दिखाई दिया, वो था महाभारत काल का राजा जरासन्ध।
         मैंने दोनों का मिलान करना शुरू किया तो पता चला की पुराने समय में इस जरासन्ध से बचने के लिए यादव शिरोमणि श्री कृष्ण मथुरा छोड़ कर द्वारका भाग गए थे। और इस युग के जरासन्ध तो आये ही द्वारका से हैं। पुराने जरासन्ध मगध के राजा थे और महाबलशाली थे। बलशाली तो ये भी खूब हैं। उन्होंने अपने दामाद कंस की हत्या का बदला लेने के लिए मथुरा पर लगातार हमले किये, और तब तक करते रहे जब तक कृष्ण मथुरा छोड़ कर भाग नही गए। लेकिन इनका दुर्भाग्य देखिये, इन्हे एक यादव ने ( लालू प्रशाद यादव ) ने मगध में ही धूल चटा दी। ऐसा नही है की ये अपने अपमान को भूल जाते हों, नही ये भी उस जरासंध की तरह ही अपमान का सख्त बदला लेने के हिमायती हैं। इसका उदाहरण केजरीवाल हैं। इन्होने अपनी हार का बदला लेने के लिए दिल्ली पर इतने हमले किये हैं, इतने तो जरासंध ने मथुरा पर भी नही किये थे।
          जमाना बदल गया है। वैसे तो मथुरा में अब भी एक यादव ही बैठा है और दोनों एक दूसरे का दुश्मन होने का दावा भी करते हैं, लेकिन लोग हैं की मानने को तैयार ही नही हैं। जब भी ये एक दूसरे के खिलाफ युद्ध की मुद्रा में आते हैं लोग जोर जोर से हंसना शुरू कर देते हैं। इस युग में इन दोनों की सुलह हो गयी है और पुराने जरासंध इनकी सुलह करवाले वाले किसी सीबीआई नाम के कूटनीतिज्ञ को ढूंढ रहे हैं।
          महाभारत काल में जब दुर्योधन ने काशीराज की पुत्री भानुमति से विवाह किया था तो जरासन्ध ने उस पर हमला किया था। तब उसके बचाव में महारथी कर्ण आये थे। तब कर्ण ने जरासंध को हरा दिया था। इस बार ये भूमिका नितीश निभा रहे थे।
            पुराने जरासंध की दो बातें और नए जरासंध से मेल खाती हैं। पहले जरासंध के साथ नरकासुर से लेकर चेदिराज शिशुपाल तक सहयोगियों की एक लम्बी कतार थी। लेकिन कृष्ण ने अपनी कूटनीति के द्वारा उसके सारे सहयोगियों को एक एक कर समाप्त कर दिया। पुराने जरासंध ने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए 95 छोटे छोटे राजाओं को कैद किया हुआ था और उनकी संख्या सौ हो जाने पर वो उनकी बलि देना चाहता था। लेकिन इस जरासंध ने ये बेवकूफी नही की। उसने 95 राजाओं को कैद करके नही रखा। उसने समय मिलते ही किसी ना किसी राजा की बलि दे दी। इसमें उसने अपने सहयोगियों का भी ख्याल नही किया। उसने रामबिलास पासवान, जीतनराम मांझी, कुलदीप बिश्नोई आदि जो भी मिला उसकी बलि दे दी। वो तो शुक्र करो की मराठा छत्रपति बाल-बाल बच गए वरना उनका सर भी बलि की वेदी पर तो रख ही दिया था।
            इस तरह की कई समानताएं मुझे दोनों में दिखाई दी। दोनों महान दानवीर हैं। मोदीजी अपनी विदेश यात्राओं में जिस तरह विदेशों में दानराशि बांटते हैं उससे ये समानता साफ झलकती है। दोनों किसी की सुनते नही हैं केवल अपनी कहते हैं। फिर भी कुछ भूल-चूक हो गयी हो तो माफ़ करना।

Saturday, October 31, 2015

बिहार चुनाव में बीजेपी की चिंता के पांच कारण

बिहार चुनाव में सबको बीजेपी के प्रचार में एक हड़बड़ाहट दिखाई दे रही है। बीजेपी ने कई बार अपनी रणनीति में परिवर्तन किये हैं और प्रचार में स्वयं प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसी बातें कहि हैं जिन्हे राजनितिक विश्लेषक उनके स्तर का नही मानते। क्या कारण है की बिहार चुनाव में बीजेपी अपने प्रदर्शन के प्रति आश्वस्त नही हो पा रही है। अब तक मिली सूचनाओं और हालात की खबरें आ रही हैं उनके अनुसार बिहार चुनाव में बीजेपी को ये पांच प्रमुख कारण चिंता में डेल हुए हैं।

१.   बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नितीश कुमार के खिलाफ कोई एंटी-इन्कम्बैंसी दिखाई नही दे रही है। बिहार के लोग नितीश कुमार को अब तक का सबसे अच्छा मुख्यमंत्री मानते हैं। उन पर ना कोई आरोप है और ना कोई भृष्टाचार का दाग है। इसकी कोई काट अब तक बीजेपी निकाल नही पाई है, बीजेपी ने नितीश पर भृष्टाचार के कुछ आरोप लगाने की कोशिश तो की है लेकिन बिहार की जनता इसे केवल चुनाव प्रचार मानती है। ये बीजेपी की चिंता का प्रमुख कारण है।

२.   बिहार में बीजेपी के पास कोई स्थानीय चेहरा नही है जिसे वो नितीश के मुकाबले में मतदाताओं के सामने पेश कर सके। अब तक कई राज्यों में बीजेपी ने बिना किसी मुख्यमंत्री की घोषणा किये चुनाव लड़ा है। उन राज्यों में बीजेपी अपनी जीत को इस रणनीति से जोड़कर देख रही है। जबकि उन राज्यों में बीजेपी की जीत का असली कारण वहां की सरकारों के खिलाफ जनता में रोष का भाव था। बिहार में पहले से बीजेपी अपना मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने पर बिहार के स्थानीय नेताओं के मतभेद सामने आने से भी डर रही है। अब तक बीजेपी इस रणनीति पर चलती रही है की जिस जाती और इलाके में जाओ, उसके नेता को ही मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर दो। इससे कई बार फायदा भी होता रहा है लेकिन बिहार में ये फार्मूला काम नही कर रहा है जो बीजेपी की चिंता का कारण है।

३.   लालू प्रशाद यादव एक बार फिर यादवों के और पिछड़ों के नेता के रूप में उभर रहे हैं। पहले के चुनावों में इधर-उधर खिसका यादव दुबारा उनके साथ गोलबंद हो रहा है। बीजेपी की पूरी कोशिश और लालू यादव की खराब छवि के बावजूद यादव और पिछड़े उसके साथ खड़े हो रहे हैं। रही सही कसर मिहं भागवत के बयान ने पूरी कर दी। बीजेपी बिहार में जातीय समीकरण का कोई तोड़ नही खोज पा रही है और ये भी उसकी चिंता का कारण है।

४.   बिहार में मुस्लिमो की बड़ी संख्या है और मुस्लिम इस बार सख्ती से महागठबंधन के साथ हैं। लालू, निटश के इकट्ठा होने से उनके बीच से असमंजस खत्म हो गयी है। बीजेपी के मुस्लिम विरोधी और साम्प्रदायिक ब्यानो ने उन्हें तेजी से महागठबंधन के  दिया है। मुस्लिम धुर्वीकरण के खिलाफ बीजेपी को उम्मीद थी की इससे दूसरी तरफ हिन्दू मतों का भी धुर्वीकरण होगा। लेकिन ऐसा हो नही रहा है। इसका मुख्य कारण बिहारी समाज में हिन्दू और मुसलमानो के बीच किसी तनाव का उपस्थित ना होना है। बीजेपी लाख कोशिश करने के बावजूद ये धुर्वीकरण करने में कामयाब नही हो पाई। आरएसएस की कोशिशें भी बेकार हो गयी। इसलिए ये भी बीजेपी की चिंता का एक कारण है।

५.   बिहार की राजनीती में एक नई चीज उभर कर सामने आई है, वो है महिला वोट बैंक। पुरे देश से अलग बिहार में महिलाओं का एक अलग वोट बैंक सामने आ रहा है जो वोटों के प्रतिशत और महिलाओं के मुद्दो के रूप में सामने आया है। नितीश सरकार ने छात्राओं को साईकिल दे कर बिहार की लड़कियों में एक नया आत्मविश्वास पैदा किया है। कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार के चलते बिहार में ये महिला वोट बैंक नितीश के समर्थन में माना जा रहा है। अब चुनाव में नितीश का महिलाओं को नौकरियों में 35 % आरक्षण का वायदा महिलाओं को आकर्षित कर रहा है। इस वोट बैंक की कोई काट बीजेपी के पास नही है। साथ ही आरएसएस की महिला विरोधी छवि इस आग में घी डालने का काम कर रही है। ये वोट बैंक बीजेपी के लिए एक बड़ी चिंता का कारण है।

 

Monday, October 26, 2015

NEWS -- बिहार चुनाव में मोदी जी का साम्प्रदायिक कार्ड

खबरी -- मोदी जी के आज बक्सर की रैली में भाषण के क्या मायने हैं ?

गप्पी -- बीजेपी और मोदी जी, दोनों को अब ये अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है की वो बिहार चुनाव हार रहे हैं। चुनाव प्रचार शुरू होने के बाद बीजेपी के नेताओं ने जो भी मुद्दे उठाये उनसे उनका नुकशान ही ज्यादा हुआ। बाद में मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए गए भाषण ने पूरी बजी ही पलट दी और बीजेपी का एजेंडा खुल कर सामने आ गया। अब बक्सर की रैली में मोदी जी ने ये कह कर की नितीश और लालू प्रशाद दलितों और पिछड़ों का आरक्षण छीन कर मुसलमानो को देना चाहते हैं और वो यानि मोदी जी अपनी जान दे देंगे लेकिन उनका आरक्षण नही छीनने देंगे, संघ की पुरानी साम्प्रदायिक लाइन ले ली है।  मोदी जी को मालूम है की मुसलमानो का तो कोई वोट उन्हें मिलने वाला नही है और दलितों और पिछड़ों के वोट में अगर वो सेंध नही लगा पाये तो वो चुनाव नही जीत सकते। इसलिए ये मोदी जी और आरएसएस का आखरी दांव है।
                     लेकिन अगर आरक्षण का मुद्दा मोदी जी और आरएसएस बहस में लेकर आते हैं तो उन्हें कुछ अप्रिय सवालों के जवाब भी देने पड़ेंगे। जैसे लालू जी पहले दिन से जातिगत जनगणना का मसला उठा रहे हैं। लालू जी का कहना है की जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी किये जाएँ और दलितों और पिछड़ों को उनकी जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण दिया जाये। इस पर बीजेपी को अपना रुख साफ करना होगा। दूसरा आर्थिक आधार पर आरक्षण के मोहन भागवत के बयान पर भी उन्हें स्पष्ट जवाब देना होगा। जातिगत आरक्षण के युद्ध में मोदी जी लालू और नितीश को हरा पाएंगे अभी तो मुस्किल लगता है, बाकि वक्त बताएगा।

Tuesday, September 29, 2015

बिहार, भाजपा और जातिवाद की राजनीती

             बिहार में भाजपा लालू प्रसाद यादव पर जातिवाद की राजनीती का आरोप लगा रही है। साथ ही ये दावा भी कर रही है की वो ये चुनाव विकास के एजेंडे पर लड़ रही है। मीडिया भी जातिवाद की बात होते ही लालू यादव को लपेटना शुरू कर देता है। लेकिन सवाल ये है की कौन चाहता है की बिहार जातिवाद की राजनीती से बाहर निकले। बिहार में चुनाव लड़ने वाली सभी पार्टियों का अपना एजेंडा है जो कहीं ना कहीं जातिवाद से जाकर जुड़ जाता है।
                बिहार में जाती हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रही है। जमीनो पर अगदी जातियों का कब्जा और खेतिहर मजदूरी करने वाले लोगों के बीच का संघर्ष भी अपने अंतिम रूप में जाती युद्ध का रूप लेता रहा है। बीजेपी पुरे देश में हिंदूवादी राजनीती करती रही है भले ही वो इसकी पैकेजिंग कभी राष्ट्रवाद के नाम पर करती रही हो या संस्कृति के नाम पर। परन्तु उसके मूल में हमेशा हिंदुत्व की राजनीती रही है।पिछला लोकसभा चुनाव, जिसमे नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत मिला, उसके लिए बीजेपी ये दावा करती रही है की वो चुनाव विकास के नाम पर लड़ा गया था। लेकिन असलियत ये है की उस समय भी हिंदुत्व की विकासशील पैकेजिंग की गयी थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है की लोकसभा में बीजेपी के चुने गए 282 सांसदों में एक भी मुस्लिम नही है। नारा था सबका साथ सबका विकास।
               अब जब बिहार का चुनाव नजदीक आ रहा था तो बीजेपी ही बिहार में जातिगत एजेंडा तय कर रही थी। नीतीश और लालू के जातीय गठबंधन को चुनौती देने के लिए बीजेपी ने ही जीतनराम मांझी को मोहरा बनाकर महादलित को राजनीती का मुद्दा बनाया। प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों में केवल महादलित ही छाया रहा। लेकिन जातिगत राजनीती में लालूप्रसाद के यादव और उसके साथ ही पिछड़े वोट बैंक को कोई ढंग की चुनौती बीजेपी नही दे पाई। अगदी जातियों को अपने अपने पक्ष में गोलबंद करने की कोशिश में मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा करने वाला बयान दे दिया और फंस गए। इस बयान से बीजेपी को अगड़ों में तो समर्थन बढ़ा परन्तु दूसरी तरह पिछड़ों का धुर्वीकरण लालू यादव की तरफ होता दिखाई दिया। अब बीजेपी इस धुर्वीकरण को रोकने के लिए लालू यादव पर जातिगत राजनीती के आरोप लगा रहे हैं।
                 लेकिन क्या अब बीजेपी जातिगत राजनीती से किनारा कर रही है ? बिलकुल नही। जब लालू यादव ये कहते हैं की ये अगड़ों और पिछड़ों के बीच की लड़ाई है तो उसके जवाब में गिरिराज सिंह और रविशंकर प्रसाद ये बयान देते हैं की NDA का मुख्यमंत्री भी कोई दलित या पिछड़ा ही होगा और कोई स्वर्ण जाती का व्यक्ति मुख्यमंत्री नही होगा, ये बयान किस तरह जातिवादी नही है ?
                     राजनीती हमेशा दो पक्षों में होती है। ये दो पक्ष कभी हिन्दू और मुस्लिम हो सकते है, कभी अगड़े या पिछड़े हो सकते है या फिर आमिर और गरीब हो सकते हैं। आरएसएस और बीजेपी हमेशा आर्थिक आधार की बात करती रही है पर वो कोई भी चुनाव आमिर और गरीब के नाम पर नही लड़ सकती। अगर उसने ये कोशिश की तो मजदूरों और किसानो के सवाल बहस में आ जायेंगे। और ये सवाल बीजेपी के विरुद्ध जायेंगे। इसलिए बीजेपी भी चाहती है की बिहार का चुनाव जाती के आधार पर लड़ा जाये बस उसमे थोड़ा सा हिन्दुत्त्व का तड़का लगा हो। और हिंदुत्तव का तड़का लगाने के लिए उसने साध्वी निरंजन ज्योति सहित अपने पुरे भगवा संगठन को काम पर लगा दिया है। इस काम में उसे ओवैसी से भी बहुत उम्मीद है। दूसरी तरफ यादवों के गठजोड़ में भरम फ़ैलाने और सेंध लगाने के लिए पप्पू यादव से लेकर मुलायम सिंह तक सभी को काम पर लगा दिया है। ये आरोप है की ये दोनों नेता अलग से गठबंधन बनाकर बीजेपी की शह पर ही लड़ रहे हैं।
                   इसलिए कोई नही चाहता, और कम से कम बीजेपी तो कभी नही चाहती की भिहार चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा जाये।

Wednesday, September 23, 2015

Vyang -- आए दिन बिहार के ( Aaye Din Bihar Ke )

बिहार सुंदरी का स्वयंबर हो रहा है। पुरे देश से महारथी अपने पुरे जोश के साथ, मूछों को खिजाब लगाकर बिहार पहुंच रहे हैं। बिहार सुंदरी को लुभाने के लिए अलग अलग तोहफे और वायदों की भरमार लगी हुई है। मुझे महाभारत में द्रोपदी का स्वयंबर याद आ रहा है। उसमे ही आधा महाभारत तो हो गया था। इसमें भी आधा तो जरूर होगा। कुछ विशेषज्ञ तो पुरे महाभारत की उम्मीद कर रहे हैं। 
                           लोकतंत्र की सुंदरी वरमाला लिए बिहार के आँगन में खड़ी है। 
 ऊपर मछली घूम रही है। नीचे बड़े बड़े धनुर्धारी लक्ष्यवेध को तैयार खड़े हैं। एक बार फिर महारथी कर्ण अपने धनुष के साथ मौजूद हैं। पिछला घटनाक्रम उन्हें याद है इसलिए इस बार अर्जुन को सबक सिखाने की पूरी तैयारी है। धनुष लेकर आगे बढ़ते हैं। तभी पीछे से आवाज आती है, " पहला अवसर मेरा है। " अर्जुन व्यवस्था का प्रश्न उठाते हैं। दादी सफेद हो गयी है। पूरा परिवार साथ में मौजूद है लेकिन कृष्ण नही दिखाई दे रहे। 
        " क्योंकि मैं सूत पुत्र हूँ इसलिए ?" कर्ण मुस्कुराते हैं। क्योंकि कर्ण जानते हैं की समय बदल चूका है। अब सूत पुत्र होना अयोग्यता का नही बल्कि योग्यता का परिचायक माना जाता है। और कर्ण इस बात को दोहराने का कोई मौका नही छोड़ते। 
         " नही, सूत पुत्र तो मैं भी हूँ। गुजरात में हमारी जाती को सूत मन जाता है। और उससे भी आगे की बात ये है की मैंने तो चाय भी बेचीं है। सो एक गरीब के पुत्र को पहला अवसर मिलना ही चाहिए। " अर्जुन ने प्रतिवाद किया। 
           " लेकिन इससे ये पूछा जाये की ये स्वयंबर में किसके लिए भाग ले रहे हैं। खुद तो ये शादी कर नही सकते। और जिस तरह पिछली बार हुआ था की इनकी माता ने तुम्हे पांच-पांच पतियों की पत्नी बना दिया था। इस बार तो 20-25 दावेदार हैं। इसलिए इन्हे तो मौका ही नही मिलना चाहिए। इनसे कहा जाये की ये पहले दूल्हे का नाम बताये। " कर्ण ने ठीक वहां चोट की जो सबसे कमजोर जगह थी। 
            " लेकिन ये कर्ण तो विश्वास घाती है। मैंने इसे अंगदेश का राजा बनाया। ये सोचकर की ये पिछली बार की तरह मेरा साथ देगा। लेकिन इसने पाला बदल लिया। ऐसे विश्वास घाती को तो तुम किसी भी तरह नही चुन सकती। " अर्जुन ने अगला पासा फेंका। 
             " तुमने मुझे अंगदेश का राजा बनने में मेरी सहायता की लेकिन तुमने पिछली बार इस एक अहसान की कितनी बड़ी कीमत वसूल की थी मुझे याद है। तुमने मुझे मेरे ही भाइयों के खिलाफ लड़ने के लिए मजबूर किया। उस समय तुम दुर्योधन के रूप में थे। इस बार तो तुमने मुझे अंगदेश के राज्य से हटाने का पूरा प्रयास किया लेकिन वो तो अच्छा हुआ यादव मेरी मदद को आ गए। सो अब तुम्हारा कोई अहसान बचता नही है। इस बार यादव पिछली बार की तरह तुम्हारे साथ नही मेरे साथ हैं। " कर्ण ने हिसाब चुकता किया। 
              अब अर्जुन के पास दूसरा कोई बहाना बचता नही था सो उसने एकाएक कुछ याद करते हुए कहा ," हम तुम्हारे लिए लाखों करोड़ के गहने और दूसरी सामग्री लेकर आये हैं। अगर तुम हमारा वरण करोगी तो हम तुम्हे सोने से लाद देंगे। " अर्जुन के साथ आए राज्य के लेखाकार ने तुरंत एक सूची सामने कर दी। 
               " इन पर भरोसा मत करना द्रोपदी। ये जो लिस्ट लेकर आये हैं उसमे तुम्हारे पुश्तैनी गहनो को भी शामिल कर लिया है। ये वो गहने हैं जो सालों पहले तुम्हे उपहार में देने की घोषणा की जा चुकी है लेकिन दिए नही गए थे। इन पर तुम्हारा पूरा अधिकार है। ये धोखेबाजी अब नही चलेगी। " कर्ण ने सख्ती से इसका विरोध किया। 
                   लोकतंत्र की सुंदरी परेशान है। सभी तरफ से दावे किये जा रहे हैं। लेकिन कोई मछली पर निशाना नही लगा रहा। सारा फैसला बातों से ही करना चाहते हैं। उसने सिर ऊपर उठाया और घोषणा की। आप लोग इधर उधर की बातें मत करिये और मछली पर निशाना लगाइये। इसमें पहले पीछे का कोई सवाल नही है। अब हमारी समझ में सब आ चूका है। सबको मौका मिलेगा और जरूरी हुआ तो इसके कई दौर भी हो सकते हैं। हमने टेनिस में फैसले के लिए पांच-पांच दौर भी देखे हैं। हमने आयोग बनाया है और वो पूरी प्रतियोगिता संचालित करेगा। और ये मत समझना की इस प्रतियोगिता में तुम दोनों ही हो। बाहर और भी लोग है जो प्रतियोगिता में भाग लेने आये हैं। हो सकता है की उनमे एकलव्य भी हो। 
                       एकलव्य का नाम सुनकर अर्जुन और कर्ण दोनों के माथे पर पसीने की बुँदे छलछला आई। 

खबरी -- मुझे साठ के दशक की एक फिल्म याद आ रही है " आये दिन बहार के " और उसके एक गाने को यों भी गाया जा सकता है। " ये वादे जब तलक हकीकत बने, इंतजार, इंतजार, इंतजार करो "

             
        

Monday, September 21, 2015

Vyang -- अगर ऐसा ना होता तो ?

देखिये सब कुछ होने पर ही निर्भर है। और जैसा हुआ है वैसा ही होने पर निर्भर है। बातचीत में बहुत लोग सवाल उठाते हैं की अगर ऐसा ना होता तो ? राजनेता तो इसे काल्पनिक सवाल कहकर ख़ारिज कर देते हैं। लेकिन हमने सोचा की अगर कुछ चीजें नही हुई होती तो क्या होता ? इस पर विचार करने पर हमने पाया की अगर ऐसा ना होता तो कैसा होता ? जैसे ----
            अगर बिहार चुनाव सामने नही होता तो मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान पर बीजेपी की क्या पर्तिक्रिया होती ? तो हमने पाया की कुछ ऐसी होती। 
   बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रशाद , " मोहन भागवत  जी ने बिलकुल वाजिब सवाल उठाया है। और ये सवाल देश की सारी जनता उठा रही है। उन्होंने ये कहा है की जब 65 साल से आरक्षण लागु होने के पश्चात भी उसका फायदा नही हो रहा है तो उसे खत्म कर दिया जाना चाहिए। लेकिन विपक्ष बहस से भाग क्यों रहा है ? हमारा मानना है की अब समय आ गया है की आरक्षण पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। "
            इसी तरह मान लो पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी नितीश से अलग नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन , " नितीश को बिहार की जनता को इस बात का जवाब देना पड़ेगा की उन्होंने बिहार की जनता के सिर पर दो साल एक अक्षम आदमी को मुख्यमंत्री के तौर पर बैठा कर रक्खा। जो आदमी खुलेआम रिश्वत लेने की बात कबूल करता है और जिसने बिहार को गड्डे में धकेल दिया है उसके जिम्मेदार खुद नीतीश कुमार हैं और अब बिहार की जनता उन्हें इस बात का जवाब देगी। "
           और मान लो अगर नीतीश बीजेपी से अलग ही नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
          बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा , " पिछले दस साल में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में हमने बिहार को बदहाली और पिछड़ेपन की दलदल से निकाल कर देश के सबसे ज्यादा तेजी से विकास करने वाले राज्यों में शामिल कर दिया है। पिछले दस साल में बिहार में विकास की जो गंगा बही है वो अन्धो को भी दिखाई दे सकती है और इस चुनाव में बिहार की जनता एक बार फिर माननीय नीतीश कुमार के नेतृत्व पर विश्वास जाहिर करेगी। "
              इसी तरह अगर केंद्र में UPA की सरकार होती और बीजेपी विपक्ष में होती तो GST बिल पर क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता अरुण जेटली , " GST पर राज्यों को कुछ गंभीर चिंताएं हैं। और जब तक केंद्र सरकार राज्यों की चिंताओं का समाधान नही करती तब तक GST का समर्थन करना हमारे लिए मुश्किल होगा। और सरकार को इस पर जोर जबरदस्ती के बजाय विपक्ष को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना चाहिए। केवल बहुमत के सहारे कानून पास करना लोकतंत्र के खिलाफ होता है। "
             मान लीजिये बीजेपी विपक्ष में होती और महंगाई के सवाल पर क्या बोलती ?
           बीजेपी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी , " देश की जनता का महंगाई से बुरा हाल है। प्याज 100 रूपये किलो और दालें 150 रूपये किलो बिक रही हैं और सरकार महंगाई घटने के आंकड़े पेश कर रही है। सरकार को समझना चाहिए की आंकड़ों से लोगों का पेट नही भरता। "
              इसी तरह की और भी बहुत सी बातें हैं जो अगर नही हुई होती तो क्या होता ? हमने केवल कुछ ही चीजों की कल्पना की है।

Sunday, July 26, 2015

Vyang -- लो बदल दिया नाम, सारे मसले हल

खबरी -- सुना है मध्यप्रदेश सरकार ने व्यापम का नाम बदल दिया ?

गप्पी -- ये बहुत अच्छा किया। बहुत बदनामी हो रही थी। वैसे तो शैक्सपीयर ने कहा था की नाम में क्या रक्खा है। परन्तु अब समय बदल गया है। अब नाम में बहुत कुछ रक्खा है। कुछ नाम दूसरी चीजों के पर्याय हो जाते हैं। जैसे कोलगेट टूथपेस्ट का पर्याय हो गया। डालडा वनस्पति घी का पर्याय हो गया। लोग नाम किसी चीज का लेते हैं और मगज में छवि किसी दूसरी चीज की होती है। जैसे बोफोर्स का नाम आते ही घोटाला याद आने लगता था। उसी तरह व्यापम की हालत हो गयी थी। व्यापम का नाम आते ही श्मशान याद आने लगता था। रात को कोई व्यापम का जिक्र कर देता तो डर के मारे रोंगटे खड़े हो जाते थे। दहशत होने लगती थी। 

                  नाम बदलने के पीछे सरकार की दूसरी मजबूरियां भी रही होंगी। जहां व्यापम का दफ्तर है उस सड़क से लोगों ने डर के मारे आना जाना बंद कर दिया होगा। और एक सड़क बेकार हो गयी होगी। दूसरा जब कोई नई नौकरी या दाखिला निकलता होगा तो बहुत से बच्चे डर के मारे फार्म ही नही भरते होंगे। घर में छोटी मोटी  कहासुनी होने पर संतान व्यापम का फार्म भर देने की धमकी देती होगी। व्यापम का नाम आते ही पता नही किस किस का चेहरा आँखों के आगे घूम जाता होगा। मुझे तो लगता है की कर्मचारियों ने व्यापम में काम करने से इंकार कर दिया होगा परन्तु सरकार ये बात दबा गयी होगी। सो उसने इस मसले का हल निकाल दिया। उसने व्यापम का नाम बदल दिया। अब अगर कोई संसद में या बाहर व्यापम घोटाले का मामला उठाएगा तो बीजेपी और शिवराज सिंह कह सकते हैं, ' कौनसा व्यापम ? हमारे यहां तो कोई व्यापम है नही। आपके यहां है क्या। " सामने वाला चुप हो जायेगा। 

                     दूसरा राजनीती में नाम बदलने का उतना ही महत्त्व है जितना पार्टी बदलने का। महाराष्ट्र के चुनाओं में बीजेपी ने एनसीपी का नाम बदल कर नैशनल करप्ट पार्टी रख दिया। चुनाव खत्म हो गए। कुछ सीटें कम पड़ी तो शिवसेना ने आँख दिखानी शुरू कर दी। शरद पवार ने समर्थन की पेशकश की तो मोदीजी ने एनसीपी का नाम बदल कर " नैशनल कॉपरेटिव पार्टी " कर दिया। उसी तरह जम्मू-कश्मीर के चुनाव में बीजेपी ने पीडीपी का नाम बदल कर " बाप-बेटी कश्मीर लूटो पार्टी " रख दिया। लोगों ने फिर धोखा दे दिया। बीजेपी ने पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली और पीडीपी का नाम बदल कर " कश्मीर विकास पार्टी "  रख दिया। 

                     अब बिहार में चुनाव आ रहे हैं तो ना जाने कितने नए नाम सुनने को मिलेंगे। शुरुआत भी हो गयी। मोदीजी ने RJD का नाम बदल कर " रोजाना जंगलराज का डर " पार्टी रख दिया। लालूजी कहाँ कम थे उन्होंने बीजेपी का  नाम बदल कर " बेशर्म और झूठी पार्टी " रख दिया। मोदीजी ने नितीश पर मांझी को हटाने को लेकर " महादलित का अपमान " करार दे दिया। बिहार के कई लोग कह रहे हैं की ये बीजेपी ही थी जिसने मांझी को कहीं का नही छोड़ा। 

                          उसी तरह नाम ही नही वायदे और नारे भी बदल रहे हैं। लोकसभा चुनाव में मोदीजी ने नारा दिया था, " कालाधन वापिस लाओ ' वायदा किया था सबको 15 -15 लाख देंगे। सारे युवाओं को रोजगार देंगे। अब नया नारा है " 24 घंटे बिजली देंगे " नया वायदा है की बिहार के लोगों को बिहार में ही काम देंगे। मोदीजी सोच रहे होंगे ये कोई दूसरे लोग हैं और लोकसभा चुनाव में दूसरे लोग थे। भूल गए होंगे, काम का दबाव रहता है। मोदीजी कह रहे हैं की बिहार को 50000 करोड़ से ज्यादा देंगे। नितीश कह रहे हैं की दे दो कौन रोक रहा है ? मोदीजी कह रहे हैं की सही समय पर इसकी घोषणा करेंगे। लोग हंस रहे हैं की नया जुमला है। 

                        कांग्रेस आरोप लगा रही है की सरकार हमारी योजनाओं का नाम बदल बदल कर वहीं  योजनाएं लागु कर रही हैं। मैं कहता हूँ की योजनाएं ही क्यों, सरकार तो हर वह काम कर रही है जो कांग्रेस करती थी। परन्तु सरकार के मंत्री इस बात के सख्त खिलाफ हैं। राजनाथसिंह कहते हैं की हमारा कोई मंत्री आरोप लगने पर UPA सरकार की तरह इस्तीफा नही देगा। बोलो फर्क हुआ की नही। अरुण जेटली जी कहते हैं की पहले हम कहते थे की संसद को चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है अब हम विपक्ष से संसद चलाने की मांग को लेकर धरना दे रहे हैं। बोलो फर्क है की नही। शुष्मा जी पहले कहती थी मंत्री के पद पर रहते निष्पक्ष जाँच सम्भव ही नही है, अब कहती हैं की बिना आरोप सिद्ध हुए इस्तीफा कैसे ? बोलो फर्क हुआ की नही 

                सो राजनीती में नाम, वायदे, नारे और बयान बदलने का अपना महत्त्व है।

Monday, June 22, 2015

हरी अनन्त, हरी कथा अनन्ता - आधुनिक महाभारत की कथा

गप्पी -- जिस तरह हरी ने इस संसार की रचना की, समय समय पर अवतार लेकर धर्म की रक्षा की, असंख्य लीलाएँ की और लोगों को संदेश दिए, उससे हरी कथा अनन्त हो गयी है। उसी तरह एक संसार की रचना और की गयी जिसे आईपीएल का संसार कहा जाता है। इस संसार के रचयिता ललित प्रभु हैं। इनकी कथा भी उतनी ही अनन्त है। जैसे जैसे इसका संसार लोगो के सामने दृष्टिगोचर हो रहा है इसका अनन्त स्वरूप सामने आ रहा है। कहते हैं की भगवान के हजारों नाम हैं उनमे एक नाम ललित भी है। इसमें एक महाभारत की शुरुआत हो गयी है। परन्तु इसके पात्र बदल गए हैं। किसी को समझ नही आ रहा है की कौन किसकी तरफ है।

                        इस युद्ध के महान धनुर्धर नरेन्द्र युद्ध के मैदान के बीचों बीच खड़े हैं। पहली महाभारत की तरह इस बार वो युद्ध से भागते नही हैं। परन्तु उन्हें समझ नही आ रहा है की वध किसका करना है। दुश्मन के खेमे से आवाज आ रही है की उसे अपने ही पक्ष के योद्धाओं में से कुछ का वध कर देना चाहिए। वो प्रभु  की तरफ देखते हैं। प्रभु  अपना विराट रूप दिखाते हैं। ये रूप इतना विराट है की धरती के दोनों छोरों तक फैला हुआ है। इसमें उन्हें सुषमा स्वराज का सिर दिखाई देता है अपने पूरे परिवार के साथ, वसुन्धरा राजे का सिर भी है अपने पुत्र के साथ, शशि थरूर का सर भी है , शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल का सर भी है। महाराष्ट्र के पुलिस कमिशनर राकेश मरिया का सिर भी है। और भी न जाने कितने सिर हैं जिनकी शक्लें अभी साफ नही हैं। अर्जुन, मेरा मतलब है की नरेन्द्र असमंजस में हैं। प्रभु  धीरे धीरे मुस्कुरा रहे हैं और कह रहे हैं की वत्स," देख लो और पहचान लो, कौन दुश्मन है और कौन साथी ," नरेंद्र हक्के बक्के खड़े हैं। धीरे से पूछते है की प्रभु क्या मुझे भी आपकी तरह रण छोड़ कर भागना पड़ेगा।

                      परन्तु ये आधुनिक युग के प्रभु हैं। इन्हे मालूम था की कानून नाम के जरासंघ से वो हार सकते हैं। इसलिए युद्ध शुरू होने से पहले ही निकल लिए। अब लन्दन नाम की नई द्वारका में बैठकर ताल ठोँक रहे हैं की मैं जरासंघ से डरता नही हूँ। कंस के द्वारपालों को रिश्वत दे कर भाग निकले और अब वेनीश और मलेशिया में गोपियों के साथ रास रचा रहे हैं।

                          प्रभु  उपदेश देते हैं की मित्र अपने पिता देवेन्द्र से बात करके दो एक मेनका मंगवा लो और दुश्मन पक्ष के कुछ योद्धाओं को भेज दो। नरेन्द्र निराशा से कहते हैं की प्रभु सीबीआई नाम की मेनका को दुश्मन के दो बड़े योद्धाओं शंकर सिंह वाघेला और वीरभद्र सिंह के पास भेज चुके हैं। उसने अपने जाल में उनको फंसा भी लिया है परन्तु दुश्मन खेमा फिर भी मजबूत नजर आ रहा है। हमने जिन दो मोर्चो पर महिला योद्धाओं को लगा रक्खा है उनके बारे में अब कुछ साथी कहते हैं की ये कमजोर कड़ी हैं इन्हे बदल दो, वरना युद्ध हारने  का खतरा है। हमने उनको बदलने का सोचा ही था की उन्होंने संदेश भेज दिया की अगर उन्हें बदला गया तो वो अपनी सेना साथ में लेकर चली जाएँगी।

                       इसलिए हे प्रभु बहुत कन्फ्यूजन है , उचित मार्गदर्शन दीजिये।

प्रभु फिर मुस्कुराते हैं और कहते हैं की," हे संघेय ! तुमने मेरे साथ ठीक नही किया। तुम्हारे नियुक्त किये हुए पुजारी मेरा सारा चढ़ावा खा गए। जबकि तुमने वादा  किया था की न खाऊंगा और न खाने दूंगा।"

             नरेंद्र मुश्किल की मुद्रा में कहते हैं की हे प्रभु, आपने वचन के अनुसार अपनी पूरी यादव सेना तो दुश्मन को दे दी और खुद मेरी तरफ आने की बजाए द्वारका निकल गए। अब मेरे रथ का सारथी नही मिल रहा है। हमारे पक्ष में जिस एकमात्र योद्धा को रथयात्रा का अनुभव था हमने बब्रुवाहन की तरह उनका सिर युद्ध की शुरुआत में  उनके ही हाथों कटवा दिया था कुल की रक्षा के लिए। अब उनका कटा हुआ सिर भी अंट शंट बोलता रहता है। हमारे मराठा नरेश शल्य की भूमिका में आ गए हैं। लड़ भी हमारी तरफ से रहे हैं और गालियां भी हमे ही दे रहे हैं। अभिमन्यु अब दूध पिता बच्चा नही रहा। वो अब मगध नरेश है। हमने जिस चक्रव्यूह का निर्माण उसको  मारने  के लिए किया था उसमे वो भीम को साथ में लेकर घुस गए हैं। हमने दुशासन और जयद्रथ को भेजा तो है परन्तु वहां से खबर आ रही है की वो आपस में लड़ रहे हैं। इसलिए बहुत मुश्किल समय है प्रभु, अगर इस समय में उचित मार्गदर्शन नही मिला तो आपका ये मित्र और भक्त युद्ध हार सकता है। ऊपर  से आप अपने विराट रूप में जब राजीव शुक्ला का चेहरा दिखाते हैं तो साथ में अरुण जेटली का भी दिखा देतें हैं। अब हमारे पास कोई शकुनि भी नही है और हम केवल सुब्रमणियम स्वामी के भरोसे हैं। इसलिए हे माधव हमारी गलतियों को क्षमा करके इस मुसीबत से निकालिये।

           लड़ाई जारी है। भगवान के विराट रूप में और किस किस के सिर लगे हैं ये धीरे धीरे साफ हो रहे हैं। ये युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच नही है। लोगों को लग रहा है की दोनों तरफ कौरव हैं। दोनों खेमे केवल एक दूसरे पर ही हमला नही कर रहे हैं बल्कि अपने पक्ष के योद्धाओं पर भी हमले हो रहे हैं। एक ही चीज एक जैसी है की प्रभु तब भी बिना हथियार उठाये सबको मार रहे थे और अब भी बिना हथियार उठाये संहार कर रहे हैं। हे प्रभु तेरी लीला अनन्त है। 

खबरी -- ये युद्ध भी अट्ठारह दिन में खत्म हो जायेगा क्या ?

Friday, June 5, 2015

सत्ता के " आम " और जीतनराम मांझी

खबरी -- खबर है की अब बिहार में आमों के लिए झगड़ा शुरू हो गया है। 


गप्पी -- "आम" के लिए झगड़ा कोई केवल बिहार में ही थोड़ा न हो रहा है, पूरी दुनिया में हो रहा है। बिहार में नितीश कुमार ने आम के बगीचे की जिम्मेदारी जीतनराम मांझी को दे दी थी। कुछ दिन ठीक चला। मांझी कुछ आम खुद खाते और बाकी टोकरे भर-भर कर नितीश कुमार को भेज देते। नितीश भी खुश थे की बिना रखवाली किए आम तो खाने को मिल ही रहे हैं। कोई पत्रकार जब मांझी से पूछता की बगीचे का मालिक कौन है तो मांझी विनम्रता से कह देते की बगीचे का मालिक तो नितीश जी हैं और वो तो केवल रखवाले हैं। खबर अख़बार में छपती और नितीश जी सन्तोष की साँस लेते की अभी प्रॉपर्टी पर कब्जा नही हुआ है। एक दिन  पत्रकार ने मांझी से पूछा की आम  का मालिक कौन है तो मांझी ने कह दिया की जब आम मेरे बंगले में लगे हैं तो मालिक भी तो मैं ही हूँगा। खबर अख़बार में छप गयी। नितीश कुमार भौचंके रह गए, किरायेदार ने मकान पर कब्जा कर लिया। छानबीन करवाई गयी तो मालूम पड़ा की आमों के टोकरे भर-भर कर गाड़ियां बीजेपी के दफ्तर जा रही हैं। लालू प्रशाद यादव ने कहा की तुम भी एकदम बौड़म हो, अरे कुछ दिन बाहर जा ही रहे थे तो बंगले में किसी घर के आदमी को छोड़ कर जाना चाहिए न मेरी तरह।  इस बार तो खाली  करवा देता हूँ बाद में ध्यान रखना। समझाने  बुझाने का सिलसिला चला। काम नही बना तो नितीश कुमार ने गांव इक्क्ठा करके किरायेदार को निकाल  बाहर किया। जब लोग मांझी का सामान उठा-उठा कर बाहर फेंक रहे थे तब मांझी बीजेपी का इंतजार कर रहे थे की अभी आए और बचा लेंगे। 

                   बीजेपी ने उनको इलाके के थानेदार की तरह आश्वासन दे रखा था की तुम्हे चिन्ता करने की जरूरत नही है। इलाके में हमारा हुक्म चलता है। अगर फिर भी कोई ऐसी-वैसी बात हुई तो ऊपर कमिशनर से बात करेंगे, वो भी हमारा है। तसल्ली करवाने के लिए दिल्ली ले जाकर कमिशनर से मीटिंग भी करवा दी। कमिशनर ने भी कह दिया की थानेदार के कहे अनुसार काम करो बाकी मैं बैठा हूँ। जब मौका आया तो थानेदार और कमिशनर दोनों ने देखा की सामान फेकने वाले ज्यादा हैं और उनकी पेश नही पड़ेगी तो उन्होंने कहना शुरू कर दिया की हो तो गलत रहा है की एक गरीब किरायेदार को घर से बाहर निकाला जा रहा है लेकिन हम कानून को अपने हाथ में नही लेंगे। मांझी बेचारे देखते-देखते सड़क पर आ गए। लोग कहते हैं की भाजपाई थानेदार  ने मांझी को कहीं का नही छोड़ा। वरना मजे से आम खा रहे थे। 

                  अब मांझी को आम खाने को नही मिल रहे हैं और वो इसकी शिकायत बीजेपी से कर रहे हैं। उनका कहना है की आम के इस मौसम में उनके लिए भी आम का प्रबंध करे। मांझी का इशारा दिल्ली से आने वाले आम के ट्रक की तरफ है जो सारे आम गिरिराज सिंह और राधामोहन सिंह जैसे ठाकुरों के घर उतार जाता है। एकाध टोकरी दलित मुहल्ले में पहुचती भी है तो रामबिलास पासवान के घर उत्तर जाती है। अब बेचारे मांझी का घर एकदम पिछली गली में है। 

                     अब रोज इस बात का शोर होता है की नितीश कुमार आम खा रहे हैं जिन पर असली हक मांझी का था। दूसरा पक्ष भी याद दिला देता है की मांझी केवल किरायदार थे और असली मालिक नितीश कुमार हैं। लेकिन बहुत दिनों से आम खाने के कारण ये सब भूल गए है की असली मालिक वो लोग है जो बंगले से बाहर खड़े हैं।